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विकास या विनाश? – मध्य प्रदेश का खौफनाक “चिता आंदोलन”

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में ‘विकास’ की एक भारी कीमत चुकाई जा रही है। पन्ना और छतरपुर जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में एक ऐसा उग्र प्रदर्शन जन्म ले चुका है, जो सीधे सत्ता और सिस्टम की अंतरात्मा पर चोट कर रहा है—इसे नाम दिया गया है ‘चिता आंदोलन’

कल्पना कीजिए उस बेबसी और गुस्से की, जहाँ चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बीच, आदिवासी महिलाएं अपने मासूम बच्चों को सीने से लगाए केन नदी की सूखी रेत पर सजी प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटी हैं। उनकी आँखों में अब कोई उम्मीद नहीं, बल्कि आर-पार की लड़ाई का आक्रोश है। उनकी जुबान पर सिर्फ एक ही नारा है—“या तो हमें न्याय दो, या फिर मौत।”

एक तरफ सरकार इस महत्वकांक्षी परियोजना को प्यासे बुंदेलखंड के लिए ‘वरदान’ बता रही है, लेकिन दूसरी तरफ इसी ‘वरदान’ की कीमत स्थानीय किसानों और आदिवासियों को अपने अस्तित्व की बलि देकर चुकानी पड़ रही है। पुश्तैनी जमीनों का जबरन अधिग्रहण, छिनती आजीविका और मुआवजे के नाम पर हो रही कथित हेराफेरी ने इन ग्रामीणों को जीवन और मृत्यु के दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।

हालात तब और बेकाबू हो गए, जब प्रशासन ने संवाद का रास्ता चुनने के बजाय कथित तौर पर सख्ती का सहारा लिया। ग्रामीणों का आरोप है कि उनका राशन-पानी तक रोक दिया गया और इलाके में धारा 163 (निषेधाज्ञा) लगाकर पूरे क्षेत्र को सील कर दिया गया। लेकिन प्रशासन की इस सख्ती ने आग में घी का काम किया है। डरने के बजाय, अब यह आंदोलन एक व्यापक जन आक्रोश में तब्दील हो चुका है।

इस ‘चिता आंदोलन’ की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का स्पष्ट कहना है कि अब यह जंग महज चंद रुपयों या मुआवजे तक सीमित नहीं है। यह आदिवासियों की अस्मिता और उनके “जल, जंगल और जमीन” को बचाने की अंतिम लड़ाई है।

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अब यक्ष प्रश्न यह उठता है: क्या सरकार समय रहते इस सुलगती आग को बुझाने के लिए कोई मानवीय और न्यायपूर्ण समाधान निकालेगी? या फिर बुंदेलखंड का यह ‘चिता आंदोलन’ एक ऐसी ज्वाला बन जाएगा जो पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख देगा?

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