बिहार के शुभम कुमार ने वह कर दिखाया है जो आज तक किसी भारतीय या एशियाई युवा ने नहीं किया था। मुंगेर जिले के एक छोटे से गाँव में जन्मे 24 वर्षीय शुभम ने दुनिया के सभी 197 देशों की यात्रा पूरी कर ली है। अपनी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के साथ वह न सिर्फ सबसे कम उम्र के भारतीय बल्कि पूरे एशिया में सबसे कम उम्र के यात्री बन गए हैं। उन्होंने यह कीर्तिमान ब्राजील में अपनी यात्रा का समापन करके हासिल किया ।
जब कोटा की कोचिंग छोड़ शुरू किया सफर
बिहार के शुभम कुमार की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। साल 2017 में जब वह महज 16 साल के थे, तो उन्हें IIT-JEE की तैयारी के लिए कोटा भेजा गया था। लेकिन कोटा की हॉस्टल की चारदीवारी में उनका मन नहीं लगा। उसी दौरान उन्होंने एक TEDx टॉक देखी, ‘How to Travel the World With Almost No Money’ (बिना पैसे के दुनिया कैसे घूमें)। यह टॉक उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुई ।
उन्होंने कोचिंग छोड़ने का फैसला लिया और अपनी फीस से मिले रिफंड के पैसों से पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा रूस की की। यह सफर इतना सुहाना रहा कि फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शुरुआती दिनों में उन्होंने अपने परिवार को बताया कि वह दिल्ली में IAS की तैयारी कर रहे हैं, जबकि वह दुनिया की सड़कों पर हिचहाइकिंग कर रहे थे ।
हिचहाइकिंग और 500 रुपये रोज का बजट
शुभम की यात्रा का सबसे खास पहलू है उनका बजट। वह आम पर्यटकों की तरह नहीं घूमते। उन्होंने करीब 50,000 किलोमीटर से ज्यादा का सफर हिचहाइकिंग (लिफ्ट लेकर) और पैदल तय किया। उनका औसत खर्च महज 400 से 500 रुपये रोज रहा ।
बिहार के शुभम कुमार ने यात्रा के दौरान कई मुश्किल हालात देखे। साइबेरिया के ओयमायाकोन शहर में उन्होंने -60 डिग्री सेल्सियस में रात गुजारी, जो दुनिया के सबसे ठंडे बसे हुए इलाकों में से एक है। वहां पहुंचने वाले वह चौथे भारतीय थे । इसके अलावा गोबी रेगिस्तान में पानी खत्म होने से उनकी जान पर बन आई थी, लेकिन स्थानीय लोगों की मदद से वह बच गए ।
| यात्रा के प्रमुख आंकड़े | विवरण |
|---|---|
| कुल देशों की संख्या | 197 |
| यात्रा का समय | 8 वर्ष (2018-2026) |
| हिचहाइकिंग की दूरी | 50,000+ किमी |
| औसत दैनिक खर्च | ₹1000-15000 |
| यूट्यूब सब्सक्राइबर्स | 3 मिलियन+ |
भारतीय पासपोर्ट से दुनिया जीतना
भारतीय पासपोर्ट पर दुनिया के हर कोने तक पहुंचना आसान नहीं था। वीजा की समस्याएं, भाषा की बाधाएं और कई देशों में पूछताछ – शुभम को हर चुनौती का सामना करना पड़ा। तालिबान-नियंत्रित अफगानिस्तान में उन्हें 8 घंटे तक हिरासत में रखा गया और देश छोड़ने को कहा गया । चीन में भी कई बार उन्हें ‘संदिग्ध’ समझकर रोका गया ।
लेकिन इन सबके बावजूद, बिहार के शुभम कुमार ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने रूसी, ताजिक, फारसी और अरबी समेत कई भाषाएं सड़कों पर ही सीखीं, ताकि स्थानीय लोगों से बातचीत कर सकें ।
यूट्यूब से लेकर बिजनेस तक
आज शुभम सिर्फ एक यात्री नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी भी हैं। उनके यूट्यूब चैनल ‘नोमैड शुभम’ के 3.9 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं । उनकी वीडियोज को 877 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है ।
हाल ही में उन्होंने ‘VisaFu’ नाम से एक वीजा कंसल्टेंसी स्टार्टअप लॉन्च किया है, जो भारतीय यात्रियों को वीजा प्रक्रिया में मदद करता है । उनकी सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद भारत के राष्ट्रपति ने उनसे फोन पर बात की और उनके काम की सराहना की ।
युवाओं के लिए प्रेरणा
बिहार के शुभम कुमार ने साबित कर दिया है कि सपने देखने के लिए बड़े बैंक बैलेंस की जरूरत नहीं होती। एक साधारण परिवार में जन्मे, सरकारी स्कूल में पढ़े इस लड़के ने दिखा दिया कि जुनून और हिम्मत हो तो दुनिया की कोई भी सीमा आपको रोक नहीं सकती। वह आज भी अपने परिवार के साथ बिहार के छोटे से गाँव में रहते हैं और युवाओं को बजट में यात्रा करने के टिप्स देते हैं ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल: बिहार के शुभम कुमार ने इतने सारे देशों की यात्रा के लिए पैसे कहाँ से लाए?
जवाब: शुरुआत में उन्होंने ऑनलाइन ट्यूशन पढ़ाकर, होटलों में वॉलिंटियरिंग करके और हॉस्टल की रिव्यू लिखकर पैसे कमाए। बाद में उनके यूट्यूब चैनल से होने वाली कमाई से उन्होंने यात्रा जारी रखी ।
सवाल: क्या वाकई बिना पैसे के दुनिया घूमना संभव है?
जवाब: शुभम की कहानी बताती है कि कम पैसे में जरूर घूमा जा सकता है। हिचहाइकिंग, काउचसर्फिंग (लोगों के घर मुफ्त में रुकना) और स्थानीय बाजारों में खाना बनाकर खर्च को बहुत कम किया जा सकता है। उन्होंने सिर्फ 1.6 लाख रुपये में 14 महीने की यात्रा की थी ।
सवाल: बिहार के शुभम कुमार अब आगे क्या करेंगे?
जवाब: 197 देश पूरे करने के बाद शुभम अब अपने वीजा स्टार्टअप ‘VisaFu’ पर ध्यान देंगे और यूट्यूब पर कंटेंट बनाना जारी रखेंगे। वह नए यात्रियों को मेंटर करना चाहते हैं ताकि वे भी दुनिया देख सकें
