नई दिल्ली, 9 फरवरी 2026 देश की राजधानी दिल्ली ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘भारत टैक्सी’ योजना को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। इस सहकारी आधारित परिवहन पहल ने न केवल सफलतापूर्वग्रहण किया है, बल्कि ‘सारथी ही मालिक’ के सिद्धांत को जमीनी स्तर पर उतारकर एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा 5 फरवरी को शुभारंभ की गई इस सेवा का संचालन ‘सहकार टैक्सी सहकारी सीमित’ द्वारा किया जा रहा है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के साथ हुए समझौते के तहत, सेवा को 34,000 वाहनों के साथ संचालन की मंजूरी मिली है, जो इसे राजधानी की सबसे बड़ी सहकारी परिवहन सेवाओं में से एक बनाता है।
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ड्राइवर-स्वामित्व वाले मॉडल की क्रांतिकारी विशेषताएं
इस सेवा की मूल भावना ड्राइवरों को केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि सह-मालिक और नीति निर्धारक के रूप में स्थापित करना है। पारंपरिक ऐप-आधारित सेवाओं से इतर, भारत टैक्सी का मॉडल कई मायनों में अनूठा है:
- शून्य कमीशन नीति: ड्राइवरों की कमाई का लगभग पूरा हिस्सा सीधे उन्हीं के पास पहुंचता है, क्योंकि प्लेटफॉर्म कोई कमीशन नहीं लेता।
- सर्ज प्राइसिंग पर रोक: यात्रियों को मौसम या मांग के आधार पर बढ़े हुए किराए (सर्ज प्राइसिंग) का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिससे पारदर्शिता और भरोसा बढ़ेगा।
- निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी: प्रत्येक ड्राइवर-सदस्य सहकारी के प्रबंधन और नीतिगत फैसलों में अपनी आवाज डाल सकता है।
पर्यटन को बढ़ावा, ड्राइवरों को प्रशिक्षण
दिल्ली पर्यटन विभाग के सहयोग से एक विशेष पहल के तहत, टैक्सी चालकों को राजधानी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आधुनिक आकर्षणों के बारे में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। इससे वे यात्रियों के लिए मात्र चालक नहीं, बल्कि ‘दिल्ली के सच्चे सारथी’ बन गए हैं। पायलट चरण में ही सेवा ने प्रतिदिन औसतन 5,500 से अधिक सवारियां दर्ज कीं, जो इसकी स्वीकार्यता का प्रमाण है।
सहकारिता: नए युग की मोबिलिटी सोच
एक वरिष्ठ परिवहन अधिकारी के अनुसार, “भारत टैक्सी सिर्फ एक परिवहन विकल्प नहीं, बल्कि सहकारिता, सम्मान और आर्थिक स्वावलंबन पर आधारित एक नई सामाजिक-आर्थिक दृष्टि है। यह ड्राइवरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिलाती है।”
भविष्य की चुनौतियां और संभावनाएं
यह मॉडल ओला और उबर जैसे निजी एग्रीगेटर्स पर निर्भरता कम करने और ड्राइवर समुदाय को सशक्त बनाने का एक सशक्त प्रयास है। हालाँकि, तकनीकी दक्षता, उपयोगकर्ता अनुभव और बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना इसके सामने प्रमुख चुनौतियाँ होंगी।
दिल्ली की सफलता से प्रेरित होकर गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य भी इस मॉडल को अपनाने पर विचार कर रहे हैं। यदि यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही, तो यह न केवल भारत के शहरी परिवहन क्षेत्र में, बल्कि सहकारिता आंदोलन में भी एक नए युग का सूत्रपात कर सकती है—जहाँ तकनीक का लाभ सीधे तौर पर कामगार तक पहुँचे और समावेशी विकास की राह प्रशस्त हो।
