Delhi book fair 2026 को किताबों के प्रेमियों के लिए ज्ञान, विचार और संस्कृति का उत्सव माना जाता है। लेकिन इस बार नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित वर्ल्ड बुक फेयर कुछ वजहों से चर्चा में आ गया—और वो वजह किताबें नहीं, बल्कि वहां मची अव्यवस्था रही।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए कई वीडियो ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या हम सांस्कृतिक आयोजनों में भी नागरिक जिम्मेदारी (Civic Sense) भूलते जा रहे हैं?
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Delhi book fair 2026: क्या होना था, क्या हो गया?
Delhi book fair 2026 का आयोजन 10 से 18 जनवरी के बीच भारत मंडपम, नई दिल्ली में किया गया। यह मेला आमतौर पर लेखकों, पाठकों, प्रकाशकों और छात्रों के बीच संवाद का मंच होता है।
हर साल यहां लाखों पाठक पहुंचते हैं और हजारों किताबें खरीदी जाती हैं।
लेकिन इस बार मेले के कुछ दृश्य बिल्कुल अलग कहानी बयां कर रहे हैं।
वायरल वीडियो में क्या दिखा?
वायरल क्लिप्स में साफ देखा जा सकता है कि:
- लोग बुक स्टॉल्स पर बिना लाइन के टूट पड़े
- कुछ लोग शेल्फ पर चढ़कर किताबें खींचते नजर आए
- भीड़ में किताबें ऊपर से नीचे फेंकी जा रही थीं
- कई जगह धक्का-मुक्की और अफरा-तफरी दिखी
एक वीडियो में एक व्यक्ति भीड़ के ऊपर झुककर ऊपरी शेल्फ से किताबें निकालता दिखता है, जबकि नीचे खड़े लोग हाथ फैलाकर उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं।
फ्री बुक ऑफर बना अव्यवस्था की वजह?
बताया जा रहा है कि यह पूरी अव्यवस्था Bloomsbury पब्लिशिंग स्टॉल पर शुरू हुई, जहां “फ्री बुक गिवअवे” की घोषणा की गई थी।
जैसे ही यह खबर फैली, वहां अचानक भीड़ उमड़ पड़ी।
- न कोई कतार
- न कोई स्पष्ट व्यवस्था
- स्टॉल स्टाफ भीड़ को संभाल नहीं पाया
जो प्रमोशनल एक्टिविटी पाठकों को जोड़ने के लिए थी, वही कुछ ही मिनटों में अराजकता में बदल गई।
Delhi book fair 2026: भीड़ और किताबों से जुड़े आंकड़े
| विवरण | अनुमानित आंकड़े |
|---|---|
| कुल आयोजन दिवस | 9 दिन |
| अनुमानित विज़िटर | 15–20 लाख |
| भाग लेने वाले पब्लिशर्स | 1,000+ |
| किताबों की श्रेणियां | शिक्षा, साहित्य, बच्चे, रिसर्च |
| औसत बुक प्राइस रेंज | ₹100 – ₹2,000 |
👉 इतने बड़े आयोजन में भीड़ प्रबंधन और नागरिक समझदारी दोनों की अहम भूमिका होती है।
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया
जैसे ही वीडियो वायरल हुए, सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
- “यह किताबों से प्यार नहीं, बस फ्री का लालच है”
- “बुक फेयर में भी ऐसी हरकत?”
- “Civic Sense आखिर गया कहां?”
कई यूज़र्स ने इसे सांस्कृतिक आयोजनों की गरिमा के खिलाफ बताया।
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन यहां व्यवहार बिल्कुल उल्टा नजर आया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि:
- भारत में फ्री ऑफर पर भीड़ का व्यवहार अक्सर नियंत्रण से बाहर हो जाता है
- शिक्षा और व्यवहार में व्यावहारिक संस्कारों की कमी दिखती है
- बड़े आयोजनों में क्राउड कंट्रोल और कम्युनिकेशन और बेहतर होना चाहिए
UNESCO की एक रिपोर्ट के अनुसार,
“सांस्कृतिक आयोजनों की सफलता सिर्फ उपस्थिति से नहीं, बल्कि सहभागियों के व्यवहार से तय होती है।”
Delhi book fair 2026 और Civic Sense का सवाल
delhi book fair 2026 जैसे आयोजन सिर्फ किताबें खरीदने की जगह नहीं होते।
ये स्थान होते हैं:
- विचारों के आदान-प्रदान के
- धैर्य और जिज्ञासा के
- सामाजिक जिम्मेदारी के
जब ऐसे मंचों पर अव्यवस्था दिखती है, तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है।
आम पाठकों के लिए एक मानवीय संदेश
किताबें हमें सोचने, समझने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।
अगर किताब लेने के लिए हम धक्का देना, चिल्लाना या अव्यवस्था फैलाना शुरू कर दें, तो सवाल उठता है—क्या हमने किताब का असली मतलब समझा?
फ्री बुक मिलना अच्छी बात है, लेकिन संयम और सम्मान उससे भी जरूरी।
निष्कर्ष
Delhi book fair 2026 ने एक बार फिर साबित किया कि भारत में किताबों के पाठक कम नहीं हैं, लेकिन Civic Sense पर अभी काम करने की जरूरत है।
उम्मीद है कि आने वाले आयोजनों में बेहतर प्रबंधन और लोगों की समझदारी से ऐसे दृश्य दोहराए नहीं जाएंगे।
